उत्तर प्रदेश फतेहपुर जनपद के थाना सुल्तानपुर घोष क्षेत्र स्थित काज़ीपुर गाँव में इमाम हुसैन (अ.स.) के बिसवाँ के अवसर पर आयोजित ऐतिहासिक ताज़िया जुलूस इस वर्ष अपनी भव्यता, अनुशासन और धार्मिक गरिमा के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। नवाबिया कमेटी की सरपरस्ती में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों अज़ादारों ने करबला के शहीदों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। पूरे गांव में ग़म-ए-हुसैन की फ़िज़ा कायम रही और “लब्बैक या हुसैन”, “या हुसैन” की सदाओं से वातावरण गूंजता रहा। इस वर्ष का आयोजन कई मायनों में ऐतिहासिक बन गया, क्योंकि पहली बार हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि विदेशों तक अपनी दर्दभरी नौहाख़्वानी के लिए पहचान रखने वाले विश्वविख्यात नौहाख़ान सैय्यद अमीर हसन आमिर ने काज़ीपुर पहुंचकर इमाम हुसैन (अ.स.) की बारगाह में पुरसा पेश किया। उनकी आमद की खबर मिलते ही प्रयागराज, वाराणसी, कौशांबी, रायबरेली, बाराबंकी, बांदा, कानपुर, सुल्तानपुर, अमेठी सहित आसपास के कई जनपदों और दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में अज़ादार काज़ीपुर पहुंच गए। नौहा ख्वान सैय्यद अमीर हसन आमिर के मंच पर पहुंचने से पहले ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लोग उनकी एक झलक पाने और उनके साथ तस्वीर लेने के लिए उत्साहित दिखाई दिए। भीड़ इतनी अधिक थी कि वाहन से मंच तक पहुंचाने में आयोजकों और पुलिस प्रशासन को विशेष मशक्कत करनी पड़ी। थाना सुल्तानपुर घोष पुलिस की सक्रिय व्यवस्था के बीच उन्हें सुरक्षित मंच तक पहुंचाया गया, जहां उन्होंने अपने दर्दभरे अंदाज़ और बुलंद आवाज़ में करबला के शहीदों की याद में ऐसे कलाम पेश किए कि पूरा माहौल ग़म और अकीदत में डूब गया। नौहाख़्वानी के दौरान बड़ी संख्या में अज़ादारों ने सीना-ज़नी कर इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 वफ़ादार साथियों की शहादत को याद किया। कार्यक्रम में जेहिदपुर की अंजुमन हुसैनिया के प्रसिद्ध नौहाख़ान हुसैन वारसी और बड़ा गांव के प्रसिद्द नौहाख्वान उस्मान अली ने भी प्रभावशाली नौहे पेश किए। उनकी अंजुमन के साथ लगभग एक सैकड़ा युवाओं ने एक साथ मातम करते हुए करबला के शहीदों को पुरसा पेश किया, जिसने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। पूरे कार्यक्रम की निज़ामत मशहूर निज़ामतकार अनीस जायसी ने की। उन्होंने अपने प्रभावशाली अंदाज़ में कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए करबला की कुर्बानी के संदेश को विस्तार से प्रस्तुत किया, जिसे लोगों ने खूब सराहा। इमाम हुसैन (अ.स.) के बिसवाँ की संध्या पर पूरी रात शब्बेदारी का आयोजन किया गया। रातभर नौहाख़्वानी, मातम, इबादत और करबला के शहीदों की याद में मजलिसों का सिलसिला चलता रहा। बड़ी संख्या में अज़ादारों ने शिरकत कर करबला के शहीदों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। सुबह ताज़िए को पारंपरिक रस्मों के साथ उठाया गया और अपने कदीमी रास्तों से होते हुए पूरे गांव में जुलूस निकाला गया। रास्ते भर अज़ादार सीना-ज़नी करते हुए इमाम हुसैन (अ.स.) को पुरसा पेश करते रहे। गांव के विभिन्न स्थानों पर लोगों ने जुलूस का इस्तक़बाल किया तथा सबील लगाकर पानी और शर्बत का वितरण किया। रात में बड़ी संख्या में आए अज़ादारों और मेहमानों के लिए भोजन की भी व्यवस्था की गई। पूरे आयोजन की व्यवस्थाओं की कमान नवाबिया कमेटी के मकसूद अली ने संभाली। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर कार्यक्रम की सभी तैयारियों को व्यवस्थित ढंग से पूरा कराया। प्रधान प्रतिनिधि मोहम्मद उमर एवं उनके बड़े भाई, पूर्व प्रधान मोहम्मद अहमद भी पूरे जुलूस के दौरान मौजूद रहे और व्यवस्थाओं की निगरानी करते रहे। कार्यक्रम के समापन पर मकसूद अली ने दूर-दराज़ से आए सभी हुसैनी अज़ादारों, मेहमानों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। जुलूस के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतज़ाम किए गए थे। थाना सुल्तानपुर घोष पुलिस बल पूरे समय मुस्तैद रहा, जिससे कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। गांव के बुज़ुर्गों, युवाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई। पूरे आयोजन में धार्मिक आस्था, अनुशासन, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरत मिसाल देखने को मिली। देर रात ताज़िए को पारंपरिक रस्मों के साथ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। इसी के साथ मोहर्रम के आयोजनों का समापन हुआ। काज़ीपुर का बिसवाँ वर्षों से अपनी प्राचीन परंपरा, धार्मिक गरिमा और अनुशासित आयोजन के लिए प्रसिद्ध रहा है, लेकिन इस वर्ष विश्वविख्यात नौहाख़ान सैय्यद अमीर हसन आमिर की पहली हाज़िरी ने इस आयोजन को नई पहचान और ऐतिहासिक महत्व प्रदान कर दिया।
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